Happy Diwali (हर बार हम ही क्यों?)
- gaurav99a5
- Oct 26, 2019
- 2 min read
हर बार हम ही क्यो ?
पिछ्ले समय मे एक ग्रुप से जुडने का संयोग हुआ, नाम है वैचारिकी, तात्कालिक मुद्दा है दीवाली पर जलाए जाने वाले पटाखे।
वो कहते है #ISTANDSWITHRAM, I don’t Burn crackers.
ठीक है साहब मत जलाइये पटाखे और पर्यावरण को बचाइये
पर हर बार, हर त्योहार पर हम ही क्यो? हम ही क्यो मिट्टी की मूर्तिया बनाए, हम ही क्यो सूखी होली मनाए, और हम ही क्यो पटाखे न जलाए?
बाकि लोगो को तो उनके त्यौहार पर कुछ भी नही कहा जाता है, ईद् और क्रिसमस जैसे उदाहरण दिए जाते है।
भाईसाहब छोटी सी बात को समझना होगी कि आप देश की जंनसंख्या का लगभग ७०% हैं, इसका मतलब यदि हम कुछ भी करते है तो उसका प्रभाव व्यापक होता है चाहे वह कोई अच्छा कदम हो या बुरा। दूसरा यह कि यदि आपसे कोई समझदारी और ज़िम्मेदारी की उम्मीद कर रहा है तो यह खुश होने की बात है न की प्रतिवाद की।
(साथ ही जो कम संख्या मे है उनकी भी जिम्मेदारी पर्यावरण के प्रति उतनी ही है।) हर एक व्यक्ति का योगदान अमूल्य है, बूंद बूंद से ही सागर बनता है।
आपको बचपन की एक कहानी याद दिलाता हू, एक बार एक राजा ने एक संकट से बचने के लिए अपनी प्रजा से अपील की, कि रात मे नगर के कुए मे सभी लोग एक गिलास दूध डालेंगे तो हमारा संकट दूर हो जाएगा, हर व्यक्ति ने यही सोचा कि मै एक गिलास पानी डाल देता हू, इतने बडे कुए मे इतने सारे लोग दूध डालेंगे किसे पता चलेगा। सुबह जब कुए को देखा जाता है तो उसमे सिर्फ पानी ही पानी था। अपने योगदान की कीमत समझिये ।
मै स्वयँ भी इस उम्र तक कई बार इस बात (पटाखे जलाने) के विरोध और पक्ष मे रह चुका हूँ !
मै यह नही कहता कि परम्पराए छोड दे। मै परम्परओ का कट्टर समर्थक हूँ और मानता हूँ कि हमारी परंपराएँ व संस्कृति ही हमारी Identity है, किंतु हर परम्परा परिस्थिति और देश्काल पर निर्भर करती है और सामाजिक हित मे यदि उनमे कोई परिवर्तन होता भी है तो उसमे कोई बुराई नहीं। ध्यान रहे कि यहा कोई आपसे दीवाली न मनाने को नही कह रहा, बस पटाखे न जलाने का अनुरोध है।
एक और बात कि यदि किसी भी परिपाटी के मूल मे जाएंगे तो पाएंगे कि उसका वर्तमान स्वरूप उसके मूल स्वरूप से थोडा अलग ही मिलेगा। इससे आगे बढेंगे तो समझेंगे कि पिछले कुछ सौ वर्षो मे हमारी परम्पराओ और संस्कृति मे बहुत से परिवर्तन आए है और वह मूल प्रासंगिकता से अवनत ही हुई है, और उनमे जो परिवर्तन आए है, वह तर्क से बहुत दूर है ।
अगर आप सनातन धर्म के सच्चे अनुयाई है तो हर परम्परा, त्यौहार, रीति के मूल मे जाए और पता करे कि उसका आरम्भ क्यो हुआ और उसे मनाने का सही तरीका क्या है? और सबसे ज़रूरी है कि यह सब अपने बच्चो को आवश्यक रूप से बताए जिससे परम्पराए मूल और प्रासंगिक बनी रहे। नही तो फिर कल वह किसी नासमझ की बातो मे आकर यही कहेंगे कि हर बार हम ही क्यो?
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