आर्या का मित्र: प्रकृति
- gaurav99a5
- May 30, 2021
- 2 min read
21.05.2021
कल मेरी बेटी को घर मे खेलने के दौरान एक छोटी सी चीटी दिखी जिसे देखकर वह काफी उत्साहित हो गई, हो भी क्यो न, अभी है ही कुछ साढे 3 वर्ष की। मैंने उस चीटी को खिलौने की एक प्लेट पर बिठा दिया और वह प्लेट उसके हाथ मे दे दी। फिर क्या था वह सारे घर मे घूमने लगी और सबको दिखाने लगी... दादू यह देखो मेरा फ्रेण्ड, मम्मा देखो मेरा फ्रेण्ड, उसने उस चीटी को अपन दोस्त बना लिया जो कि सुनने मे बडा मज़ेदार था व बच्चो की निच्छलता का जीता जागता उदाहरण्। थोडी देर मे वह इतनी खुश हो गई कि जब वह चीटी प्लेट से उसके हाथ मे चढ गई तब भी उसे डर नही लगा और वह सावधानी से उसे देख कर खुश हो रही थी। फिर मैं उस चीटी को वापस प्लेट पर ले आया। चीटी चलते चलते प्लेट के दूसरी तरफ पहुंच गई तो बिटिया बोली कि पापा देखो ये नीचे चले गई इसे मना करो, यह गिर जाएगी। वह उस प्लेट को उसका घर कहने लगी, जब भी चीटी प्लेट से बाहर जाती वह कहती चलो वापस घर मे। कुछ मिनटो के खेल मे वह काफी खुश थी व उसे ऐसा करते देखकर हम सभी घरवाले भी।
इस पूरे घटनाक्रम ने अंतर्मन को इतनी खुशी दी जिसे मे व्यक्त नही कर सकता। यह सामान्य खुशी नही थी, यह मन व मस्तिष्क को अंदर से तरो ताज़ा (रिफ्रेश) करने वाली प्रक्रिया थी।
सोचिये हम अपने आप पर इतना गैर ज़रूरी बोझा लिए फिरते है कि हम इन छोटी खुशियो का लाभ भी नही ले पाते।
बच्चे तो वैसे भे निश्छल होते है, उनकी प्रकृति ही प्रेम करने की होती है। पर क्या कभी सोचा है कि हम कैसे इन क्षणो का आनंद ले सकते है।
सीधा सा जवाव है प्रकृति। प्रकृति से जितना जुडेंगे उतना ही जीवन सरल होगा। हम स्वयम प्रकृति का हिस्सा है या कहे स्वयम ही प्रकृति है। बस जीवन के झंझटो मे हम इससे कही दूर आ गए है। ऊपर वर्णित घटना से मुझे अपने बचपन की याद आ गई। शायद आपको भी आ गई होगी, न भी आए हो तो ज़रा याद करे अपने बचपन को, और यह भी याद करे कि जीवन कितना सरल था उस समय, क्योकि हम प्रकृति के अधिक करीब थे।
आज के समय मे हर व्यक्ति परेशान सा रहता है कारण भिन्न भिन्न है, पर हर व्यक्ति जीवन से जूझ रहा है। हम दैनिक रूप से छोटे छोटे प्रयास करके प्रकृति के करीब आ सकते है व इन परेशानियो को दूर य कम तो कर ही सकते है।
यह तरीका बागवानी हो सकता है, किसी पालतू पशु- पक्षी को पालना, पशु पक्षियो की सेवा, चिडियो की चहचहाट सुनना, तितलियो जुगनुओ के करीब जाना, घरवालो के साथ समय बिताना, जल स्रोतो की निकटता, वनो के बीच जाना, खेतो मे जाना व धीरी धीरे फसलो को बढते देखना, वहाँप्रक्रति को अपनी बाहे पसारते हुए देखना यहाँ तक कि ज़मीन पर नंगे पैर चलने से भी आप प्रक्रति से जुड सकते है, और यह निश्च्य ही आपके अंदर की अस्थिरता को कम करेगा। प्रयास करे और मेरा दावा है को आप जितने प्रकृति के करीब जाएंगे अपने आपको उतना ही हल्का और मुक्त पाएंगे जिससे आपकी ही कार्य कुशलता व जीवन चर्या मे सुधार होगा।
यकीन माने ये जादूई है।
गौरव भार्गव
Opmerkingen